Islam me aurat ka Makam in hindi | इस्लाम में औरत का मक़ाम इन हिंदी | Skip to main content

S.A.KHALIFA

जब जिंदगी में कुछ समझ न आए तो क्या करें? इन हिंदी। Jab zindagi me kuch samaj na aaye to kya Karen? In hindi

  जब जिंदगी में कुछ समझ न आए तो क्या करें? इन हिंदी। Jab zindagi me kuch samaj na aaye to kya Karen? In hindi  🌙 जब जिंदगी में कुछ समझ न आए तो क्या करें? | अल्लाह पर भरोसा, सब्र और उम्मीद की इस्लामी सीखकभी-कभी जिंदगी में परेशानी ऐसी बढ़ जाती है कि इंसान के पास सब कुछ होते हुए भी दिल परेशान रहता है। कभी किसी अपने की चिंता… कभी घर की परेशानी… कभी पैसों की फिक्र… कभी किसी दुआ के पूरा होने का इंतजार… और कभी ऐसी परेशानी जिसका हल इंसान को दूर-दूर तक नजर नहीं आता। ऐसे वक्त में दिल के अंदर एक सवाल उठता है— “आखिर अब क्या होगा?” लेकिन एक मोमिन के लिए मुश्किल वक्त का मतलब यह नहीं कि अल्लाह ने उसे अकेला छोड़ दिया है। बल्कि यही वह समय है जब इंसान को अपने रब की तरफ और ज्यादा लौटना चाहिए । 🌿 कुरआन हमें मायूस होना नहीं सिखाता अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है: “अल्लाह की रहमत से मायूस न हो।” सूरह अज़-ज़ुमर, 39:53 यह आयत उस इंसान के लिए बहुत बड़ी उम्मीद है जो अपनी जिंदगी की परेशानी से टूट चुका हो। गलतियां हो गई हों, दुआ में देर हो रही हो या हालात मुश्किल हों—अल्लाह की रहमत का दरवाजा बंद नहीं...

Islam me aurat ka Makam in hindi | इस्लाम में औरत का मक़ाम इन हिंदी |

इस्लाम में औरत का मक़ाम

इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो ज़िंदगी के हर पहलू में इंसाफ़, रहमत और बराबरी की तालीम देता है। इस्लाम में औरत को बहुत ऊँचा मक़ाम दिया गया है, लेकिन अफ़सोस कि अक्सर इस्लाम की तालीमात को ग़लत समझा जाता है या सांस्कृतिक रवायतों के साथ मिला कर पेश किया जाता है। इस ब्लॉग में हम क़ुरआन और हदीस की रोशनी में इस्लाम में औरत के असल मक़ाम को समझने की कोशिश करेंगे।

इस्लाम से पहले औरत की हालत

इस्लाम के ज़ुहूर से पहले अरब समाज में औरत की हालत बेहद खराब थी। उसे न विरासत का हक़ था, न इज़्ज़त का। कहीं-कहीं तो बेटियों को ज़िंदा दफ़न कर दिया जाता था। ऐसे माहौल में इस्लाम ने औरत को न सिर्फ़ इंसान माना बल्कि उसे मुकम्मल हक़ात दिए।

क़ुरआन की नज़र में औरत

क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"और हमने बनी आदम को इज़्ज़त बख़्शी" (सूरह अल-इसरा: 70)

यह आयत साफ़ बताती है कि मर्द और औरत दोनों बराबर इज़्ज़त के हक़दार हैं। क़ुरआन में औरत को माँ, बेटी, बहन और बीवी हर हैसियत से रहमत बताया गया है।

माँ के रूप में औरत

इस्लाम में माँ का मक़ाम सबसे बुलंद है। हदीस में आता है कि एक सहाबी ने रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा: "सबसे ज़्यादा हुस्न-ए-सुलूक का हक़दार कौन है?" आपने फ़रमाया: "तुम्हारी माँ" — यह जवाब तीन बार दिया गया। इससे माँ की अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

बेटी के रूप में औरत

इस्लाम ने बेटी को बोझ नहीं बल्कि नेमत बताया है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख़्स बेटियों की अच्छी परवरिश करता है, उनके साथ मेहरबानी करता है, वह जन्नत का हक़दार होगा।

बीवी के रूप में औरत

निकाह इस्लाम में एक पाक रिश्ता है जो मोहब्बत और रहमत पर क़ायम है। क़ुरआन में फ़रमाया गया:

"और उसने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से जोड़े बनाए ताकि तुम उनसे सुकून पाओ, और तुम्हारे दरमियान मोहब्बत और रहमत रखी" (सूरह अर-रूम: 21)

बीवी के साथ अच्छा सुलूक करना ईमान की अलामत बताया गया है।

तालीम और हक़ूक़

इस्लाम ने औरत को तालीम हासिल करने का पूरा हक़ दिया है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है।" इसके अलावा औरत को विरासत, मेहर, पसंद से निकाह और ख़ुला जैसे हक़ भी दिए गए हैं।

ग़लत फ़हमियाँ और हक़ीक़त

अक्सर इस्लाम पर यह इल्ज़ाम लगाया जाता है कि वह औरत को दबाता है, जबकि हक़ीक़त यह है कि औरत पर ज़ुल्म समाजी और सांस्कृतिक रिवायतों की वजह से होता है, न कि इस्लामी तालीमात की वजह से।

नतीजा

इस्लाम में औरत का मक़ाम बेहद आला और इज़्ज़त वाला है। वह समाज की बुनियाद है। अगर इस्लामी तालीमात पर सही तरीक़े से अमल किया जाए तो औरत को हर वो हक़ मिल सकता है जिसकी वह हक़दार है। ज़रूरत है सही समझ और अमल की।



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🧕🏻कौन थी तुम❓

पैर की जूती थी तुम, 
बोझ थी तुम, 
ज़िल्लत का बाइस थी तुम, 
ज़िंदा दफ़न होती थी तुम, 

कौन हो तुम ?  

✧सर का ताज हो तुम, 
✧ज़िम्मेदारी हो तुम, 
✧इज़्ज़त का निशान हो तुम, 
✧मुहब्बत की पहचान हो तुम, 
✧जन्नत की सरदार हो तुम, 

आज
◉ तुम माँ हो तो जन्नत, 
◉ बेटी हो तो रह़मत,
◉ बीवी हो तो मुह़ब्बत, 
◉ बहन हो तो इज़्ज़त, 

✧༺♥️༻✧
किसने दिया ये मुक़ाम ?
तुम्हारे रब ने, 
किसने दिलाया ये मुक़ाम ?
तुम्हारे नबी ﷺ ने, 
किसके ज़रिए ?
इस्लाम के ज़रिए, 
✧༺♥️༻✧

☆ ना तुम्हें जिहाद का हुक़्म, 
☆ना तुम्हें बा-जमाअ़त नमाज़ का हुक़्म, 
☆ना तुम्हें रोज़ी कमाने की फ़िक़्र, 
☆ना तुम्हें ज़क़ात अदा करने की फ़िक़्र, 

क्या हुक़्म है तुम्हारे लिए ?

बा-पर्दा रहो, 
अपने आप को ढांप कर रखो, 
कि *तुम क़ीमती हो,*
कि *तुम अल्लाह की रहमत हो,* 
कि *तुम इस्लाम की बेटी हो,*
कि *तुम फ़ातिमा बिन्ते मुहम्मद ﷺ की क़नीज़ हो,* 
कि तुम औ़रत हो, 
कि तुम औ़रत हो,

• तुम बच्चों को दूध पिलाओ तो अ़ज्र,           
• तुम खाना खिलाओ तो अ़ज्र, 
• तुम शौह़र की ताबेदार रहो तो अ़ज्र, 
• तुम रात जाग कर घर वालों की देख-रेख, करो तो अ़ज्र, 
• तुम ख़ुद सहरी आधी छोड़ कर बाक़ियों को खिलाओ तो अ़ज्र, 
• तुम अपने भाई का मान रखो तो अज्र, 
• तुम अपने बाप का फ़ख़्र का़यम रखो तो अ़ज्र

अब बताओ की इस्लाम तुमको क्या नहीं देता इतना रुतबा तुमको इस्लाम ने दिया है..!


सैयदा फ़ातिमा की क़नीज़ बन जाओ । और अपने वक़ार को इतना बुलन्द कर लो के कोई तुम्हे इस्लाम से और उस्के दायरे से कभी भी ना हटा सकें।  

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यह ब्लॉग इस्लाम में औरत का मक़ाम इन हिंदी इस मक़सद से लिखा गया है कि इस्लाम की असल तालीमात को समझा जाए और ग़लत फ़हमियों को दूर किया जा सके।


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